🍀रुपये की वैल्यू (मूल्य) कम होने को अर्थशास्त्र की भाषा में 'रुपये की गिरावट' (Depreciation) कहा जाता है। यह एक जटिल प्रक्रिया है जो वैश्विक और घरेलू दोनों कारणों से प्रभावित होती है।
इसे समझने के लिए नीचे दिए गए बिंदुओं को देखें:
🍀1. रुपये की वैल्यू कैसे और क्यों घटती है?
🍀रुपये की कीमत मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा बाजार (Forex Market) में डिमांड और सप्लाई के खेल पर टिकी होती है।
- 🍀कच्चे तेल की कीमतें: भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो भारत को उसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर देने पड़ते हैं। डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपया कमजोर हो जाता है।
- 🍀व्यापार घाटा (Trade Deficit): अगर भारत विदेशों से सामान (जैसे सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स) ज्यादा खरीद रहा है और अपना सामान (Export) कम बेच रहा है, तो देश से डॉलर बाहर ज्यादा जाता है। डॉलर की कमी रुपये को गिरा देती है।
- 🍀अमेरिकी डॉलर की मजबूती: अगर अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो दुनिया भर के निवेशक अपना पैसा भारत जैसे बाजारों से निकालकर अमेरिका में लगाने लगते हैं। इससे बाजार में डॉलर कम हो जाते हैं और रुपया गिर जाता है।
- 🍀विदेशी निवेशकों की निकासी: जब विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकालकर किसी दूसरे देश में ले जाते हैं, तब भी रुपये की वैल्यू घटती है।
🍀2. रुपये के गिरने से क्या प्रभाव पड़ता है?
रुपये की गिरावट का असर हर आम और खास आदमी की जेब पर पड़ता है:
🍀3. सरकार और RBI क्या करते हैं?
🍀जब रुपया बहुत ज्यादा गिरने लगता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) दखल देता है। RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) से डॉलर बाजार में बेचता है ताकि डॉलर की सप्लाई बढ़ सके और रुपये की गिरावट को थामा जा सके।
🍀निष्कर्ष: रुपये की वैल्यू गिरना केवल अर्थव्यवस्था का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आपकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) को कम कर देता है। यानी, आज आप ₹100 में जो सामान खरीद पा रहे हैं, रुपया कमजोर होने पर उसी सामान के लिए आपको शायद ₹105 या ₹110 खर्च करने पड़ें।
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