😡 रंगा और बिल्ला (कुलजीत सिंह और जसबीर सिंह) की कहानी भारत के आपराधिक इतिहास की सबसे खौफनाक और चर्चित कहानियों में से एक है। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि 1978 में दिल्ली में हुआ एक वास्तविक और दिल दहला देने वाला अपराध है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।
इसे *"गीता और संजय चोपड़ा अपहरण और हत्याकांड"* के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं कि उस वक्त क्या हुआ था:
1. मासूम बच्चों का अपहरण
26 अगस्त 1978 की शाम को, ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के एक प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए दो भाई-बहन घर से निकले थे। 16 साल की गीता चोपड़ा और उनका 14 साल का छोटा भाई *संजय चोपड़ा* नई दिल्ली के धौला कुआं इलाके में लिफ्ट का इंतजार कर रहे थे।
तभी वहां से एक फिएट कार गुजरी, जिसमें रंगा और बिल्ला सवार थे। उन्होंने बच्चों को लिफ्ट देने के बहाने अपनी कार में बिठा लिया। रंगा और बिल्ला असल में पेशेवर अपराधी थे और उनका मकसद फिरौती के लिए किसी अमीर घर के बच्चे का अपहरण करना था।
2. जब रंगा-बिल्ला को अपनी गलती का एहसास हुआ
कार में बैठने के बाद जब रंगा और बिल्ला ने बच्चों से उनके परिवार के बारे में पूछा, तो उन्हें पता चला कि दोनों बच्चे भारतीय नौसेना के नौसेना अधिकारी (कैप्टन) मदन मोहन चोपड़ा के बेटे-बेटी हैं।
अपराधियों को समझ आ गया कि उन्होंने एक बहुत बड़े सैन्य अधिकारी के बच्चों को हाथ लगा दिया है और अब पुलिस उन्हें किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगी। पकड़े जाने के डर से उन्होंने फिरौती मांगने का विचार छोड़ दिया और बच्चों को मार डालने का भयानक फैसला किया।
3. बच्चों का संघर्ष और क्रूरता
गीता और संजय ने हार नहीं मानी। दोनों ने कार के भीतर अपराधियों का बहादुरी से मुकाबला किया। लेकिन रंगा और बिल्ला ने बेरहमी से दोनों भाई-बहन पर चाकू से कई वार किए। गीता के साथ दुष्कर्म (Rape) की कोशिश भी की गई। अंत में, दोनों अपराधियों ने दोनों बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी और उनकी लाशों को दिल्ली के रिज (Ridge) इलाके के जंगलों में फेंक कर फरार हो गए।
4. देशव्यापी आक्रोश और गिरफ्तारी
दो दिन बाद जब बच्चों के शव बरामद हुए, तो पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई। संसद से लेकर सड़कों तक हंगामा मच गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार पर अपराधियों को पकड़ने का भारी दबाव था।
दिल्ली पुलिस और सेना ने मिलकर एक बड़ा तलाशी अभियान शुरू किया। रंगा और बिल्ला दिल्ली से भागकर एक ट्रेन में छिप गए थे। लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। सह-यात्रियों को उन पर शक हुआ और उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी। आखिरकार, आगरा के पास दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया।
5. अंजाम: फांसी की सजा
यह मामला अदालत में चला और दोनों के खिलाफ पुख्ता सबूत मिले। रंगा और बिल्ला को इस जघन्य अपराध के लिए *मौत की सजा (फांसी)* सुनाई गई।
> 31 जनवरी 1982 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में रंगा और बिल्ला को एक साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
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इस घटना का समाज पर असर
बहादुरी पुरस्कार (Geeta & Sanjay Chopra Award): इन दोनों बच्चों की बहादुरी को याद रखने और सम्मानित करने के लिए भारत सरकार ने हर साल गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर दिए जाने वाले "राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार" के तहत 'गीता चोपड़ा पुरस्कार' और 'संजय चोपड़ा पुरस्कार' की शुरुआत की। यह पुरस्कार आज भी उन बच्चों को दिया जाता है जो असाधारण बहादुरी दिखाते हैं।
सुरक्षा नियम: इस घटना के बाद से दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा और अनजान लोगों से लिफ्ट न लेने को लेकर जागरूकता बहुत ज्यादा बढ़ गई।
रंगा और बिल्ला का नाम आज भी भारत में क्रूरता और खौफ के एक काले अध्याय के रूप में लिया जाता है।