18.7.26

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा न केवल #ओडिशा के पुरी शहर का, बल्कि पूरे विश्व का एक अत्यंत पवित्र और भव्य उत्सव है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को शुरू होने वाली इस यात्रा के पीछे कई पौराणिक कथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं।


आइए जानते हैं रथ यात्रा से जुड़ी सबसे प्रमुख और लोकप्रिय कहानियां:


 🌸 बहन सुभद्रा की नगर भ्रमण की इच्छा (सबसे प्रचलित कथा)

   एक बार भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों—भगवान कृष्ण और बलराम जी—से द्वारका नगरी देखने की इच्छा जताई। अपनी लाडली बहन की इस इच्छा को पूरा करने के लिए कृष्ण और बलराम ने उन्हें एक भव्य रथ पर बैठाया और खुद भी अलग-अलग रथों में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकल पड़े।


🌸 नगर के लोग अपने प्यारे भगवान और उनके भाई-बहन को एक साथ रथ पर देखकर अत्यंत हर्षित हुए। इसी याद में हर साल पुरी में भगवान जगन्नाथ (कृष्ण), बलभद्र (बलराम) और सुभद्रा जी की रथ यात्रा निकाली जाती है।


 🌸 मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) की यात्रा

   धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। पुरी के मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडीचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है।


 🌸 यहाँ तीनों भाई-बहन 9 दिनों तक रुकते हैं।


 🌸 मौसी के घर पर भगवान का खूब आदर-सत्कार होता है, जहाँ उन्हें स्वादिष्ट 'पोडा पीठा' (एक विशेष प्रकार का व्यंजन) खिलाया जाता है।


 🌸 9 दिन बीतने के बाद भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं, जिसे 'बहुड़ा यात्रा' (उल्टी रथ यात्रा) कहा जाता है।


 🌸 राजा इंद्रद्युम्न और अधूरी मूर्तियों की कथा

   एक पौराणिक कथा के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। मूर्तियों को बनाने के लिए स्वयं देव-शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने राजा के सामने एक शर्त रखी कि वह 21 दिनों में बंद कमरे के भीतर मूर्तियों का निर्माण करेंगे, लेकिन इस दौरान कोई भी कमरे का दरवाज़ा नहीं खोलेगा। 


🌸 यदि दरवाज़ा खुला, तो वह काम वहीं छोड़ देंगे।

कमरे के अंदर से लकड़ी तराशने की आवाज़ें आती रहीं। लेकिन जब कई दिनों तक कोई आवाज़ नहीं आई, तो रानी गुंडीचा और राजा इंद्रद्युम्न व्याकुल हो गए। उत्सुकतावश राजा ने 15वें दिन ही कमरे का दरवाज़ा खोल दिया। शर्त टूटने के कारण भगवान विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी (बिना हाथ और पैर के) ही रह गईं।


🌸 राजा अपनी गलती पर बहुत रोए, तब भगवान विष्णु ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि चिंता मत करो, मैं इसी रूप में संसार का कल्याण करूँगा। इसके बाद राजा ने इन अधूरी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया और तब से हर साल इस दिव्य रूप की रथ यात्रा निकाली जाती है।


🌸 रथ यात्रा से जुड़ी कुछ खास और रोचक बातें:


 🌸 तीन अलग-अलग रथ: यात्रा में तीनों भाई-बहनों के लिए अलग-अलग रथ होते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम 'नंदीघोष' है (रंग: पीला और लाल)। भाई बलभद्र के रथ का नाम 'तालध्वज' है (रंग: हरा और लाल)। बहन सुभद्रा के रथ का नाम 'दर्पदलन' या 'पद्मध्वज' है (रंग: काला और लाल)।


 🌸 छेरा पहरा: यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के राजा स्वयं आकर सोने की झाड़ू से तीनों रथों के सामने के रास्ते को साफ करते हैं। यह रस्म यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा हो या रंक, सब एक समान हैं।


 🌸 लकड़ी के रथ: इन रथों को बनाने में किसी भी प्रकार के कील या धातु का उपयोग नहीं होता। हर साल नीम की पवित्र लकड़ियों से बिल्कुल नए रथ बनाए जाते हैं।


मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से इस रथ यात्रा में शामिल होता है और भगवान के रथ की रस्सी को छूता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

जय जगन्नाथ! #jaijagannath

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