23.10.26

दुर्गा माँ की प्रतिमा का विसर्जन क्यों किया जाता है?

दुर्गा माँ की प्रतिमा का विसर्जन हमारी परंपरा और सनातन संस्कृति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और गहरा दार्शनिक हिस्सा है। इसे केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के चक्र का प्रतीक माना जाता है। विसर्जन के पीछे मुख्य कारण और मान्यताएँ निम्नलिखित हैं:


 ✨ब्रह्मांडीय चक्र (उत्पत्ति, स्थिति और संहार): हिंदू दर्शन के अनुसार, इस सृष्टि में जो भी रूप धारण करता है, उसका अंत निश्चित है। जिस प्रकार हर जन्म की एक समाप्ति होती है, उसी प्रकार प्रतिमा रूप में पृथ्वी पर पधारी देवी का अपने लोक (कैलाश) वापस लौटना इस सृष्टि के शाश्वत नियम (उत्पत्ति, पालन और विसर्जन) को दर्शाता है।


 ✨मिट्टी से बने शरीर का पंचतत्व में विलीन होना: प्रतिमाएँ सामान्यतः मिट्टी, पानी और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती हैं। विसर्जन के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि "मिट्टी से बने शरीर को अंततः मिट्टी में ही मिलना है" (पंचतत्व में विलीन होना)। यह जीवन की नश्वरता (सच्चाई) का प्रतीक है।


  ✨माँ की विदाई (बेटी के रूप में विदाई): बंगाल और उत्तर भारत की कई परंपराओं में माँ दुर्गा को विवाहित पुत्री माना जाता है जो हर साल शारदीय नवरात्रि में अपने मायके (पृथ्वी) आती हैं। दशमी के दिन उन्हें उसी तरह भारी मन से विदाई दी जाती है, जैसे विदाई के बाद एक बेटी अपने ससुराल लौटती है। इस दिन सुहागिनें सिंदूर खेला करती हैं और माँ को अगले साल फिर जल्दी आने का न्योता देती हैं।


  ✨चैतन्य का जल में समाहित होना: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के दौरान मंत्रों और हवन के माध्यम से प्रतिमा में जो प्राण-प्रतिष्ठा (दिव्य ऊर्जा) की जाती है, विसर्जन से पहले उसका उपसंहार कर दिया जाता है। इसके बाद जल में विसर्जन करने से वह ऊर्जा पुनः जल और प्रकृति के स्रोतों में समाहित हो जाती है।


✨संक्षेप में, प्रतिमा विसर्जन इस बात का स्मरण कराता है कि हर रूप अस्थायी है, लेकिन उस शक्ति और चेतना का प्रभाव शाश्वत है।


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